क्या बांग्लादेश अब हिंदुओं के लिए सुरक्षित नहीं रहा। यह सवाल गुस्से से नहीं पूछा जा रहा। यह सवाल किसी पॉलिटिकल मकसद से नहीं पूछा जा रहा। यह सवाल पिछले 12 दिनों में बांग्लादेश की सरजमी पर गिरी तीन लाशों से पूछा जा रहा है।
पिछले 12 दिनों में बांग्लादेश में तीन हिंदुओं की हत्या कर दी गई है। तीनों घटनाएं अपने-अपने तरीके से डराती हैं। इसलिए नहीं कि हिंसा हुई या लोगों की मौत हुई। इसलिए कि इनमें कानून कम और बेखौफी ज्यादा दिखाई देती है।
Fear Among Hindus in Bangladesh: मारने वालों को भरोसा क्यों है?
ऐसा लगता है जैसे मारने वालों को भरोसा है कि अब वो मार देंगे तो उन्हें कुछ होगा नहीं। मारते वक्त कोई रोकेगा नहीं। और यहीं से बांग्लादेश डराने लगता है। वही बांग्लादेश जिसके लिए हिंदुस्तान ने कुर्बानियां दी थीं। जिसे पाकिस्तान से अलग करवाया गया था।
क्या बांग्लादेश भी पाकिस्तान के रास्ते पर चल पड़ा है। जैसे पाकिस्तान में हिंदू सेफ नहीं हैं, वैसे क्या बांग्लादेश में भी नहीं हैं।
Hindu Migration Fear: क्या बांग्लादेश से भी पलायन होगा?
क्या आने वाले समय में बांग्लादेश से भी हिंदुओं का बड़ी संख्या में पलायन होगा। क्योंकि ऐसा ही होता है। पहले डराया जाता है। फिर डर पैदा हो जाता है। फिर हर चीज में डर होता है। फिर धीरे-धीरे लोग खिसक जाते हैं।
आज पाकिस्तान में हिंदू आबादी 2% बची है। क्या बांग्लादेश में भी यही होने वाला है।
Mymensingh Killing Case: फैक्ट्री के अंदर गोली और मौत
ताजा मामला बांग्लादेश के मैमन सिंह जिले का है। एक कपड़ा फैक्ट्री में रोज की तरह काम चल रहा था। कोई प्रदर्शन नहीं। कोई तनाव नहीं। 42 साल का बजेंद्र सिक्योरिटी गार्ड था। ड्यूटी कर रहा था।
साथ में नोमान तैनात था। बातचीत हो रही थी। अचानक नोमान उठा। सरकारी शॉर्ट गन उठाई और गोली मार दी। गोली जांग में लगी। थोड़ी देर में मौत हो गई।
आरोपी गिरफ्तार हुआ। केस दर्ज हुआ। लेकिन सवाल गिरफ्तारी का नहीं है। सवाल यह है कि कामकाजी जगह के भीतर इतनी आसानी से जान चली गई।
Rajbari Mob Killing: जब भीड़ ने अदालत बनकर फैसला दिया
कुछ दिन पहले राजबाड़ी जिले में 29 साल के अमृत मंडल की हत्या हुई। इस बार गोली नहीं थी। भीड़ थी। आरोप था जबरन वसूली का।
हो सकता है आरोप सही हो। हो सकता है गलत हो। लेकिन फैसला अदालत करती है। भीड़ नहीं। फिर भीड़ ने फैसला सुनाया। सजा दी। मौके पर जान ले ली गई।
यहां भी वही सवाल है। अगर अपराध था तो गिरफ्तारी होती। और फिर यह बैक टू बैक हिंदुओं के साथ कैसे होने लगा।
Dhaka Blasphemy Killing: अफवाह, तमाशा और मौत
इससे पहले ढाका के पास दीपपू चंद्र दास की हत्या हुई। यह सिर्फ हत्या नहीं थी। सार्वजनिक तमाशा थी। पीटा गया। घसीटा गया। पेड़ से लटकाया गया। जलाया गया।
आरोप ई निंदा का था। बाद में जांच में सामने आया कि सोशल मीडिया पोस्ट का कोई सबूत नहीं था। जिस आरोप पर मारा गया, वह साबित ही नहीं था।
तो फिर सजा किसने दी। क्यों दी। और क्या भीड़ निश्चिंत थी।
Pattern of Violence: संयोग नहीं, संकेत
इन तीन घटनाओं को अलग-अलग कहना आसान है। कोई कहेगा पर्सनल मामला। कोई कहेगा आपराधिक। कोई राजनीतिक उबाल।
लेकिन कम समय में एक ही समुदाय के लोग मारे जाएं तो यह संयोग नहीं रहता। संकेत बन जाता है। हर मामले में एक समान माहौल दिखता है। अफवाह। आरोप। गुस्सा। कानून पीछे। भीड़ आगे।
यहीं से समाज फिसलना शुरू करता है।
Attacks on Hindus in Bangladesh: पहले भी हुआ है
यह पहली बार नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में हिंदू बस्तियों पर हमले हुए। मंदिरों में तोड़फोड़ हुई। घर दुकानें जलाई गईं।
कई बार सुरक्षा बल मौजूद रहे। फिर भी हिंसा नहीं रुकी। हर बार कहा गया अलग-थलग घटना है। लेकिन जब घटनाएं बार-बार होती हैं तो दिशा दिखाने लगती हैं।
Pakistan Example: डर से खत्म होता समुदाय
जनसंख्या अचानक नहीं घटती। समुदाय अचानक गायब नहीं होते। पहले डर आता है। फिर असुरक्षा रोजमर्रा बनती है। फिर पलायन होता है।
पाकिस्तान इसका उदाहरण है। हिंदू सिख आबादी एक दिन में नहीं घटी। डर के साथ सालों में घटी।
Big Question Today: कौन सुरक्षित है?
आज सवाल यह नहीं कि घटना के बाद क्या कार्रवाई हुई। सवाल यह है कि घटना से पहले उस माहौल को बनने क्यों दिया गया।
सवाल यह नहीं कि कौन मरा। सवाल यह है कि कौन सुरक्षित है।
और अगर इस सवाल का जवाब साफ नहीं है, तो यह समस्या एक समुदाय की नहीं है। यह उस समाज की समस्या है जहां इंसान की जान धीरे-धीरे सस्ती होती जा रही है।
आपको क्या लगता है।
क्या बांग्लादेश में हिंदुओं की जान सस्ती हो गई है।
क्या वो असुरक्षित हैं।
सवाल बड़ा है।
