सिर्फ 1 आदत और आपकी पहचान पूरी तरह बदल जाएगी, David Goggins के ये सच जान गए तो खुद को बदल लोगे

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अगर आप इस लेख को पढ़ रहे हैं तो एक बात साफ है। आप एवरेज नहीं हैं। लेकिन कड़वा सच यह है कि आपकी आदतें बिल्कुल एवरेज हो सकती हैं। आज दुनिया में एक महामारी फैली है। यह किसी वायरस की नहीं बल्कि एक दिमागी बीमारी की बात है, जिसका नाम है मीडियोग्रिटी यानी औसत बने रहने की बीमारी।

मीडियोग्रिटी: औसत बने रहने की बीमारी

सुकरात ने कहा था कि एक इंसान के लिए इससे बड़ी शर्म की बात और कोई नहीं हो सकती कि वह बूढ़ा हो जाए और कभी अपनी उस शारीरिक और मानसिक ताकत को ना देख पाए जिसके लिए उसका शरीर बना था। सवाल यह है कि क्या आप अपनी जिंदगी बस गुजार रहे हैं।

मीकटी सोच और हथियार डाल देने की आदत

डेविड गोगिंस की कहानी हमें यह समझाती है कि समस्या वजन, करियर या हालात नहीं होते। असली समस्या यह होती है कि इंसान ने जिंदगी में हथियार डाल दिए होते हैं। जब भी कुछ कठिन होता है, वह रास्ता बदल लेता है। जब भी दर्द होता है, वह पीछे हट जाता है। इसी सोच को मीकटी कहा जाता है, किसी तरह काम चल जाए वाली सोच।

हम एक ऐसी दुनिया में रहना चाहते हैं जहां हमें कोई चैलेंज ना करे। बस उतना ही पढ़ लो जितने में एग्जाम पास हो जाए। बस ऐसी नौकरी ढूंढ लो जहां सुकून हो। हमने कंफर्ट को अपना भगवान बना लिया है।

फ्रॉग ब्रेन बायस और मीडियोग्रिटी की जड़

आपका दिमाग, विशेष रूप से लिंबिक सिस्टम, महान बनने के लिए डिजाइन नहीं किया गया है। यह आपको जिंदा और सुरक्षित रखने के लिए बना है। जब आप रिस्क लेते हैं तो दिमाग चिल्लाता है, खतरा है। जब आप सुबह जल्दी उठना चाहते हैं तो दिमाग कहता है, सो जा।

आप आलसी नहीं हैं। आप बस अपनी बायोलॉजी के गुलाम हैं। और इसी गुलामी का नाम है मीडियोग्रिटी।

संघर्ष की आग में खुद को पाना

फ्रेडरिक नीचे ने कहा था, बिकम हु यू आर। वह बनो जो तुम असल में हो। और जो तुम हो वह आराम में नहीं बल्कि संघर्ष की आग में मिलेगा।

न्यूरोसाइंस बताता है कि दिमाग का एक हिस्सा, एंटीरियर मिड सिंगुलेट कॉर्टेक्स, तब बड़ा होता है जब आप वह काम करते हैं जो आप नहीं करना चाहते। जब आप मन मारकर जिम जाते हैं, जब ठंडे पानी से नहाते हैं, तब आपकी विल पावर की मसल मजबूत होती है।

अगर आप संघर्ष नहीं कर रहे हैं तो आपका दिमाग सिकुड़ रहा है।

दर्द सहने की क्षमता और 1% लोग

दुनिया बदलने वाले 1% लोगों के पास कोई जादुई शक्ति नहीं होती। फर्क सिर्फ एक होता है, पेन टॉलरेंस। दर्द सहने की क्षमता।

आप अंदर से खुश नहीं हैं क्योंकि आपके करंट सेल्फ और आपके पोटेंशियल सेल्फ के बीच बहुत बड़ा अंतर आ गया है। आप जानते हैं कि आप बेहतर कर सकते हैं, लेकिन आप कर नहीं रहे।

डर के उस पार की दुनिया

डेविड गोगिंस की 160 किलोमीटर की रेस हमें सिखाती है कि जब हर तर्क, हर लॉजिक, हर डॉक्टर रुकने को कहता है, वहीं असली लड़ाई शुरू होती है। यही वह खाई है जहां 99.9% लोग लौट आते हैं।

40% रूल यही कहता है कि जब आपका दिमाग कहता है कि आप पूरी तरह थक चुके हैं, तब आपने अपनी क्षमता का सिर्फ 40% ही इस्तेमाल किया होता है।

दर्द का विरोधाभास

द पेन पैराडॉक्स यह बताता है कि आप जितना दर्द से भागेंगे, जीवन आपको उतना ही अधिक कष्ट देगा। लेकिन अगर आप स्वेच्छा से दर्द को चुनते हैं, तो जीवन का कष्ट आपको छू भी नहीं पाएगा।

जिम में मसल्स आखिरी रेप्स में बनते हैं। दिमाग तब तेज होता है जब आप वह किताब पढ़ते हैं जो समझ नहीं आ रही, लेकिन आप फिर भी पढ़ते रहते हैं।

जीत और हार की आदत

विनर इफेक्ट बताता है कि जीतना एक आदत है और हारना भी एक आदत। जब आप अलार्म बंद करके दोबारा सोते हैं, आप अपने दिमाग को हारने की ट्रेनिंग दे रहे होते हैं।

मोटिवेशन गार्बेज है। मोटिवेशन जलकर खत्म हो जाता है। आपको अपनी आइडेंटिटी बदलनी होगी।

कंफर्ट का जाल और यूनिवर्स 25

यूनिवर्स 25 प्रयोग ने साबित किया कि बिना संघर्ष के दिमाग और समाज दोनों सड़ जाते हैं। असीमित आराम, असीमित सुविधा अंत में विनाश लाती है।

आपका सोफा, आपका नेटफ्लिक्स और आपकी सुविधाएं धीरे-धीरे आपके दिमाग की हत्या कर रही हैं।

आखिरी सच

एक दिन यह सब खत्म हो जाएगा। आपके सामने दो लोग खड़े होंगे। एक वह जो आप बन गए और दूसरा वह जो आप बन सकते थे। अगर दोनों के बीच बहुत बड़ा अंतर हुआ, तो वही असली नर्क होगा।

औसत बनकर आप कभी खुश नहीं रह सकते। संघर्ष आपको जीवन देता है।

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